यूपी में बीजेपी के ब्राह्मण नेताओं की लंबी फेहरिस्त, लेकिन सबका सवाल एक? आख़िर जितिन प्रसाद क्यों!

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लेखक: नरेश वत्स, वरिष्ठ पत्रकार

उत्तर प्रदेश में 12 फीसदी ब्राह्मण वोटर इन दिनों बीजेपी से नाराज है। इनकी नाराज़गी की वजह बताई जा रही है योगी सरकार के प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा अपनी शक्तियों का बेजा इस्तेमाल करना।

 कहा तो ये भी जा रहा है कि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्य योगी नाथ को फैसलें लेने में स्वतंत्रता नही दी जा रही है । योगी सरकार के प्रति ब्राह्मण समाज में नाराजगी से बीजेपी का केन्द्रीय नेतत्व पशोपेश में है। सवाल उठता है कि क्या बीजेपी के पास प्रदेश में ब्राह्मण नेताओं की कमी हैं? ‘गैरों से लगाव और अपनों से दुराव ‘ की नीति बीजेपी को कितना फायदा पहुंचा पायेगी ?

यूपी बीजेपी में ब्राह्मण नेताओं की लंबी फेहरिस्त है। उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा, उर्जा मंत्री श्री कांत शर्मा , पर्यटन मंत्री नीलकंठ तिवारी, उत्तरप्रदेश के बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी, प्रयागराज की मेजा विधानसभा सीट से एम.एल.ए नीलम उदयभान करवरिया, कानून मंत्री बृजेश पाठक, पूर्व बीजेपी अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी आदि। लेकिन बीजेपी पार्टी आलाकमान ने पार्टी के निष्ठावान ब्राह्राण नेताओं की बजाय कांग्रेस के नेता पर दांव लगाया है। कहा जा रहा है कि मोदी –शाह की जोड़ी गुजरात मॉडल को उत्तरप्रदेश में भी लागू करना चाहती है ।

जितिन प्रसाद जब कांग्रेस में थे तो वह ब्राह्मण चेतना मंच के नाम से एक संगठन चलाते थे, उनका प्रभाव सिर्फ ललितपुर, शाहजहांपुर के आसपास के इलाकों तक सीमित है। जितिन प्रसाद आज तक किसी ब्राह्मण नेता को यूपी की विधानसभा में नही पहुंचा पाए हैं। जितिन प्रसाद ऐसे नेता जो खानदानी कांग्रेसी रहे और 2014 के बाद लगातार चुनाव हारते रहे। साल 2014 में उन्होंने धौरहरा सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। इसके बाद 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव भी हार गए। 2019 में लोकसभा धौरहरा से कांग्रेस के टिकट पर लड़े और बुरी तरह से हार गए।

बीजेपी आलाकमान के इस फैसले से प्रदेश के ब्राह्मण मतदाताओं में मायूसी है। बीजेपी पार्टी की निस्वार्थ सेवा कर रहे ब्राह्मण नेताओं से उनके समर्थक सवाल पूछ रहे हैं आखिर कांग्रेस से ब्राह्मण नेताओं को लाने से पार्टी में उत्साह का संचार कैसे होगा। यूपी बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष रहे रमापति राम त्रिपाठी, लक्ष्मीकांत वाजपेयी पूरे प्रदेश के ब्राह्मणों की नब्ज पहचानते हैं। इसी तरह से प्रयागराज का करवरिया परिवार चित्रकुट, बांदा तक के इलाकों में अपना प्रभाव रखता है। इस परिवार की बहु नीलम उदयभान करवरिया मेजा विधानसभा सीट से बीजेपी की एमएलए हैं। प्रयागराज के कई जिलों में वो राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं।

योगी सरकार में कानून मंत्री बृजेश पाठक हरदोई के रहने वाले हैं। बृजेश पाठक ने लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति से सियासी जीवन की शुरूआत की और छात्रसंघ अध्यक्ष भी चुने गए। पहले कांग्रेस में फिर बसपा में शामिल हो गए और साल 2004 में लोकसभा सीट पर बसपा प्रत्याशी के रूप में सांसद निर्वाचित होने के बाद राष्ट्रीय राजनीति के गलियारों में आ गए।

डॉ दिनेश शर्मा उत्तरप्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं और प्रदेश में एक बड़े ब्राह्मण नेता के रूप में इनकी पहचान है। वर्ष 2006 में लखनऊ के प्रथम बार मेयर चुने गए उसके बाद साल 2012 में दूसरी बार लखनऊ के मेयर इतने भारी मतों से चुने गए कि लिम्का बुक ऑफ रिकार्डस में इनका नाम दर्ज है।

पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र के भतीजे ब्रह्रादेव मिश्र का प्रभाव भी जौनपुर के इलाकों में है।

लक्ष्मी कांत वाजपेयी बीजेपी के दिग्गज नेता हैं और मेरठ शहर से एमएलए भी रह चुके हैं इसके अलावा यूपी में दुग्ध विकास राज्य मंत्री भी रह चुके हैं। वे यूपी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं, काफी लंबे समय से राजनीतिक वनवास काट रहे हैं।

मेजर सुनील दत्त दिवेद्वी 17 वीं उत्तरप्रदेश विधानसभा में फरूखाबाद सीट से विधायक बन कर पहुंचे। उनके पिता स्वर्गीय ब्रह्म दत्त दिवेद्वी प्रदेश के बड़े ब्राह्मण नेता थे। रेस्ट हाउस कांड में पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की जान बचाकर सुर्खियां बटोरी थीं। रमापति राम त्रिपाठी की गिनती उत्तरप्रदेश बीजेपी के दिग्गज ब्राह्मण नेताओं में होती है। रमापति त्रिपाठी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष और एमएलसी रह चुके हैं। सांसद योगी सरकार में पर्यटन मंत्री नीलकंठ तिवारी मूल रूप से देवरिया के रहने हैं। नीलकंठ तिवारी पेशे से अधिवक्ता हैं और वर्ष 2017 के उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में वाराणासी शहर दक्षिणी सीट से पहली बार एम.एल.ए चुने गए। इसी तरह उत्तरप्रदेश सरकार में उर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा मथुरा-वृदावंन से विधायक हैं। उनकी पहचान ब्रज क्षेत्र के एक बड़े ब्राह्मण नेता के रूप में है। समाजवादी पार्टी और बसपा ब्राह्मण वोटरों को लुभाने के लिए जातीय सम्मेलन कर रही हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी को अपने स्थापित नेताओं पर भरोसा करना चाहिए, क्योंकी चुनाव जीतने के लिए गुजरात मॉडल पुराना पड़ चुका है।

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